फेंको मत, हमें दो ” स्लोगन के साथ बाल संरक्षण की अनूठी पहल।

 

कैमूर से चन्दन कुमार सिंह रामगढ़ सदर रेफरल अस्पताल में फेंको मत हमें दो के होर्डिंग के साथ पालना रखा गया है जो आने जाने वाले मरीजों और आमजन में कोतूहल का विषय बना है। बताया जाता है कि जिले के सभी प्रखंड अस्पतालों में बाल संरक्षण इकाई के द्वारा एक मुहिम चलाई गई है जिसमें अनाथ और वैसे नवजात जिनको पैदा करने के बाद किसी कारणवश फेंक दिया जाता है को बचाने के लिए यह मुहिम चलाया गया है।
भ्रूण हत्या रोकने और लैंगिक असमानता को हतोत्साहित करने के लिए बड़ी-बड़ी योजनाएं, कानून और जागरुकता के लिए  सरकार द्वारा दीवार पर लेख, और समय समय पर जारूकता कार्यक्रम चलाया जाता मगर लोग आत्मसात नहीं करते यही वजह है कि तकरीबन हर माह किसी न किसी रूप में जैविक कचरा (जिनमें बेटियों की संख्या अधिक होती है) सड़क पर फेंका जा रहा है। इसे  विडंबना ही कहा जाएगा कि वे बच्चे कितने बेचारे हैं, जिनको मां का आंचल और पालना मयस्सर नहीं है। उनसे भी अभागे वे बच्चे हैं, जिन्हें कफन भी नसीब नहीं होता। हालंकि ये सवाल हमेशा अनुत्तरित रहेगा कि मारना ही था तो आखिर उन्हें कोख में पाला ही क्यों गया।
दरअसल क्षेत्र में मृत नवजातों को झाडिय़ों में फेंंकने की प्रवृत्ति लगातार बढ़ रही है। ये वे मृत नवजात हैं, जिनके माता-पिता सामने नहीं आते। वे अपने बच्चों के गुनाहगार हैं।  हैरत ये है कि ऐसे गुनाहगारों की शिनाख्त कभी नहीं हो पाती। अधिकतर मृत नवजात झाडिय़ों और डस्ट बिन में पाए जाते हैं। सड़कों पर भी फेंकने की कई घटनाएं  हुई हैं। जानकारों का कहना है कि शहर में तो ये बच्चे गिनती में आ भी जाते हैं, लेकिन गांवों की घटनाएं तो दर्ज ही नहीं हो पाती हैं। जानकारी के मुताबिक जितने बच्चे कचरे में फेंके जाते हैं  उनमें से कई जिंदा भी बचते हैं। जो सरकारी शिशु घरों में पाले जाते हैं।
झाडिय़ों में फेंके जा रहे बच्चों में अधिकतर सभी केस लड़कियों के होते हैं। ये घटनाएं साबित करती हैं कि हमारा समाज अभी भी बच्चियों के प्रति सौतेला व्यवहार रखता है और क्रूर है। इस समस्या का समाधान सिर्फ और सिर्फ जागरुकता है। जो अभी तक नहीं आ सकी। 
इस पर प्रकाश डालते हुए रामगढ़ रेफरल अस्पताल के प्रभारी डॉक्टर सुरेंद्र कुमार सिंह ने लोगों से अपील करते हुए कहा कि कहीं भी लावारिस नवजात शिशु अगर मिलता है तो उसे अस्पताल में स्थित पालने में लाकर रख दें रखने वालों का नाम और पता गोपनीय रखा जाएगा वही बच्चों का भरण पोषण सरकार कब तक करेगी जब तक उनको किसी के द्वारा गोद नहीं ले लिया जाता है। इस मुहिम को रामगढ़ के प्रबुद्ध नागरिकों व समाजसेवियों ने सरकार की एक सकारात्मक पहल बताते हुए सराहना की।

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