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December 16, 2017
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मुकेश कुमार सिंह का विश्लेषण—–

नारी उरोज काम तृष्णा के लिए नहीं है, मासूम नौनिहालों के लिए संजीवनी है स्तनपान| वक्षस्थल आकर्षक दिखे, इसलिए नारियां बच्चों को स्तनपान कराने से बच रहीं|

सृष्टिकाल से नारी गूढ़ रहस्यों का संसार रही हैं । नारी के प्रत्येक अंग को लेकर दार्शनिक विचार और उपमाओं से कसीदे कढ़े गए हैं ।आज हम भी नारी के एक विशिष्ट अंग को लेकर चर्चा करने को विवश हुए हैं ।नारी को देवी,श्रद्धा,शील,धीर और ना जाने कितने नामों से पुकार कर उनकी महत्ता को स्थापित करने वाले समाज से आज का हमारे आलेख का विषय कई सवाल करेगा और उनसे जबाब तलब भी करेगा ।
नारी के उरोज,नितम्ब,स्तन,छाती,वक्षस्थल और ना जाने कितने और नाम होंगे इसके,हम आज इसपर ही अपने विचार साझा कर रहे हैं ।एक नारी तबतक अधूरी समझी जाती है,जबतक उसे मातृत्व सुख नहीं मिलता,यानि जबतक वह गर्भ धारण कर माँ नहीं बन जाती ।नौ महीने की कठोर,असहनीय और असीम वेदना के बाद पुत्र अथवा पुत्री धन की प्राप्ति होती है ।हमारी समझ से एक बार माँ बनने वाली नारी का पुनर्जन्म होता है ।धीरे–धीरे माँ के रूप में नारी स्वस्थ होकर पटरी पर लौटती है और उधर वह मासूम दुनिया से दो–चार होने लगता है ।यह वह समय है जब एक माँ का दूध उस मासूम के लिए अमृत साबित होता है ।लेकिन आज के बदले सामाजिक परिवेश में नारी अपने मासूम को स्तनपान कराने से परहेज करती हैं ।महानगर से शहर और अब गाँव तक नारी इस बीमारी की गिरफ्त में आ चुकी हैं ।पाश्चात्य देशों में अधिकतर नारी अपने बच्चों को स्तनपान कराने से गुरेज और परहेज इसलिए करती रहीं हैं कि उन्हें अपने वक्षस्थल को सुडौल रखकर खुद को आकर्षक बनाये रखना है ।ठीक वही हवा अपने देश में दशकों से बह रही है ।आज तो पाश्चात्य संस्कृति को धकेल कर हम आगे निकलने की कवायद करते दिख रहे हैं ।

आज की नारी से पहले हम,कम उम्र की लड़कियों की चर्चा पहले जरूरी समझ रहे हैं ।समलैंगिकता के नाम पर छोटी उम्र की लड़कियां छात्रावास में हस्त मैथुन का शिकार होती हैं ।यहां या तो उनकी इच्छा होती है,या फिर इच्छा उनपर लादी जाती है ।हम खुले सफे से कहते हैं कि यहीं से पुरुष का भी हस्तक्षेप शुरू होता है ।इसके बाद बढ़ती उम्र की लड़कियों में यह रोग बढ़ता जाता है और वे अपने प्रेमी से लेकर पति तक से हस्त मैथुन या अन्य मैथुन की शिकार होती हैं,या अपनी रजामंदी से इस कार्य के संपादन का साझीदार बनती हैं ।जब नारी किसी की पत्नी बनकर माँ बन जाती है,तो उनके वक्षस्थल पर सारा अधिकार उसके मासूम का होता है लेकिन विडम्बना देखिए कि अमूमन मासूम बाहरी दूध पीने को विवश किये जाते हैं और उन्हें माँ के अमृत दूध से भिज्ञ भी नहीं होने दिया जाता है । यहां भी यही मानसिकता है कि अगर मासूम दूध पियेगा,तो नितम्ब के आकर्षण आएगी ।यानी शरीर सुडौल और आकर्षक दिखे,इसके लिए मातृत्व गौण हो जाता है ।हम इस कड़ी में एक घटना का जिक्र करना बेहद जरूरी समझते हैं ।

घटना बिहार के सहरसा के सदर थाने की है ।तत्कालीन थानाध्यक्ष ने एक दिन अहले सुबह हमें फोन कर के कहा कि भैया जल्दी थाना आईये,एक बेहद संगीन मामला है ।हम बिना समय गंवाए थाना पहुंचे ।थाने में एक आकर्षक युवती,एक मासूम बच्चे को गोद में लिए बैठी थी ।हम जैसे ही कक्ष की कुर्सी पर बैठे की थानेदार ने हमें एक आवेदन दिया,जो उस युवती ने एफआईआर के लिए दिया था ।उस आवेदन को पढ़कर हमारे ना केवल रौंगटे खड़े हो गए बल्कि हम बेहद शर्मिंदगी महसूस करने लगे ।सच कहें तो हमने वहां रो दिया ।युवती ने आवेदन में लिखा था कि उसके पति,उसके बच्चे के हिस्से का दूध खुद पी जाते हैं ।उसका मासूम बच्चा मर जायेगा । उसके पति पर कठोर कार्रवाई की जाए ।हमने अपने जीवन में एक से बढ़कर एक संगीन मामले देखे हैं ।लेकिन यह वाकया ऐस ना था,जो हमें काठ मार गया था ।इस मामले को निपटाने की जिम्मेवारी थानेदार ने हमें सौंप दी ।हमने गहन मनन के बाद,फोन कर के उस युवती के पति को बुलाया ।एक बन्द कमरे में वैज्ञानिक,मनोवैज्ञानिक और चिकित्सीय बातचीत के साथ–साथ हमने मानवीय मूल्यों की बातें उनसे करी ।वह शख्स अपनी गलती का ना केवल अहसास किया बल्कि हमारे मना करने के बाबजूद थाने में मौजूद सभी अधिकारियों के सामने अपनी पत्नी के पांव छूकर मांफी मांगी और आगे से कभी इस कुकृत्य को ना दुहराने की शपथ ली ।कुछ महीनों तक वह युवती हमें बड़ा भाई बनाकर,अपने बदले हुए पति के बारे में हमें जानकारी देती रही ।वह बेहद खुश है,इसके लिए वह हमें सारा श्रेय देती रही ।

हम यह आलेख लिखने को इसलिए मजबूर हुए हैं कि हम भारतीय संस्कृति के लोग रिश्तों के संसार को जीते हैं ।हर रिश्ता एक मर्यादा के लिहाफ में होता है ।स्तनपान बच्चों के लिए बेहद जरूरी और गुणी है ।नारी को जहां इसके लिए सजग होने की जरूरत है,वहीं पुरुषों को अपनी कामी सोच बदलने का दम दिखाना है ।सैक्स जीवन के लिए जरूरी है लेकिन उसके लिए संस्कारित और मानक से भरे तरीके अपनाए जाने चाहिए ।नारी “नारीत्व”में और पुरुष “पौरुष”में बहुत प्रासंगिक और ओजस्वी प्रतीत होते हैं ।नारी के उरोज काम क्रीड़ा,खेलने और काम तृष्णा की तृप्ति के लिए नहीं,अपितु नवजात के लिए संजीवनी हैं ।।